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विहार चुनाव - सबका गणित उलझ गया

बिहार का चुनाव अपने अंतिम दौर में है, लेकिन नतीजा अभी भी किसी सस्पेंस फिल्म की तरह अंधेरे में है. हालत यह है कि कोई भी बड़ा दिग्गज अपनी जीत या बढ़त का दावा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. कारण, नए परिसीमन के बाद से सभी धुरंधरों का जोड़-घटाना कुछ ऐसा गड़बड़ाया कि उनके माथे पर पसीना आ गया. नए परिसीमन के बाद हुए इस पहले चुनाव में बाज़ी किसके हाथ लगेगी, इसका जवाब राजनीतिक पंडितों के पास भी नहीं है. बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत और उसमें महिलाओं की भागीदारी के क्या मायने हैं, इसे लेकर चौक-चौराहे पर बहस जारी है. कुछ लोग इसे सत्ता विरोध तो कुछ इसे सत्ता के पक्ष का रुझान मान रहे हैं. मतदाताओं की चुप्पी ने तो जीत-हार के सवाल को और भी उलझा दिया है. अगर-मगर के गणित में नेताओं के दिन कट रहे हैं. पूरे दिन समर्थकों से बात करते-करते शाम को वे यह कहकर बैठक खत्म कर देते हैं कि 24 नवंबर को सब कुछ सा़फ हो जाएगा.

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी सोनपुर में भाजपा के विनय कुमार सिंह के समक्ष कांटे की लड़ाई में फंसकर रह गई हैं. सही आकलन चुनाव परिणाम आने के बाद संभव है. फिलहाल ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना का़फी मुश्किल है.

अगर नवंबर 2005 के चुनाव की बात करें तो उस समय पूरे बिहार की तो नहीं, लेकिन कम से कम बड़े नेताओं के चुनाव क्षेत्र के बारे में एक सा़फ राय ज़रूर बनाने में सहूलियत हुई थी कि किस वीआईपी सीट पर कौन सा वीआईपी उम्मीदवार आगे चल रहा है, लेकिन इस बार तो सारे राज़ जैसे ईवीएम में ही छिपकर रह गए हैं. सार्वजनिक तौर पर तो बड़े नेता अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, पर दिल की बात पूछने पर कहते हैं कि बताना बड़ा मुश्किल है, लेकिन जैसे-तैसे निकल जाएंगे. दावे के साथ कोई दिग्गज नेता सही मायनों में अपनी जीत का दावा करने की स्थिति में नहीं है. जातीय ध्र्रुवीकरण के कारण जो अनुमान लगाया जा रहा है, वह अधूरा है, क्योंकि केवल एक जाति के आधार पर किसी सीट का परिणाम नहीं बताया जा सकता. दूसरी बात यह है कि मतदाताओं की चुप्पी से सारा मामला उलझ गया है. अति पिछड़े, महादलित एवं मुसलमान वोटों का रु़ख ऐसा रहा कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने में दिक्कत हो रही है. कोसी इलाक़े में लवली आनंद, रंजीता रंजन, महबूब अली कैसर, विजेंद्र यादव एवं रेणु कुशवाहा आदि की सीटों पर जिस तरह मतदान हुआ, उससे इन नेताओं की सांस फूल रही है. उक्त बड़े नेता यह बताने की हालत में नहीं हैं कि उनकी सीट निकल रही है या नहीं. छोटे नेताओं की सीटों का हाल इससे भी अधिक उलझा हुआ है.

आमतौर पर सारण प्रमंडल के तीनों ज़िले छपरा, सीवान और गोपालगंज चुनावी हिंसा के लिए कुख्यात रहे हैं, लेकिन इस बार अभूतपूर्व सुरक्षा के बीच शांतिपूर्ण मतदान ने रिकॉर्ड बनाया है. मतदान प्रतिशत में इज़ा़फे से नतीजों की भविष्यवाणी करने वाले जानकारों का गणित भी गड़बड़ा गया है. मतदान के बाद कोई यह कहने की स्थिति में नहीं है कि किस विधानसभा क्षेत्र में किसकी जीत होगी. इसका एक कारण यह भी है कि प्रशासनिक तौर पर बूथों पर किसी भी तरह की गड़बड़ियों को नामुमकिन बना दिया गया है. अब लोग हार-जीत की अटकलें जातीय वोट बंटवारे के आधार पर लगा रहे हैं, लेकिन सभी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि राजद, जदयू और कांग्रेस के परंपरागत जातीय वोटों में दूसरे और तीसरे ने सेंधमारी की है. 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद के गढ़ सारण से जनता ने उसका सूपड़ा सा़फ कर दिया था. पिछले चुनाव में राजद के मात्र दो विधायक जीतकर विधानसभा पहुंच पाए थे. इस बार राजद ने ज़िले के सभी 10 विधानसभा क्षेत्रों में से एक अमनौर को छोड़ शेष 9 स्थानों पर अपने दमदार प्रत्याशियों को लड़ाया, जिनमें छपरा सहित महाराजगंज संसदीय क्षेत्र अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों एकमा, मांझी, बनियापुर एवं तरैया में पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह के समर्थक प्रत्याशी मैदान में थे. शेष सीटों पर राजद के पुराने सिपहसालार प्रत्याशी बनकर जनता के बीच खड़े थे. महाराजगंज के वर्तमान राजद सांसद उमाशंकर सिंह का शुरुआती दौर से ही दल के उम्मीदवारों के ़िखला़फ बग़ावती तेवर हैरान करता नज़र आया. इसका लाभ अंतत: एनडीए प्रत्याशियों को मिलना तय
माना जा रहा है. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की तऱफ से ज़िले की सभी सीटों पर राजद के माय समीकरण के अलावा राजपूत वर्ग के उम्मीदवार खड़े कर दिए जाने से राजद को अपनी चुनावी नैय्या पार लगाने में परेशानियों का सामना करने की नौबत आ गई है.

इस तरह के हालात सीवान और गोपालगंज विधानसभा क्षेत्रों में अक्सर दिखते हैं. गोपालगंज में लालू प्रसाद के साले साधु यादव कांग्रेस के उम्मीदवार हैं, वहीं रघुनाथपुर में कांग्रेस पूर्व विधान पार्षद डॉ. चंद्रमा सिंह को अपना झंडा थमाकर राजद के नए एमआरवाई समीकरण को चुनौती देने पर तुली है. सारण ज़िले के अंतर्गत भाजपा को मिली चार विधानसभा सीटों में से तीन पर राजपूत बिरादरी के उम्मीदवारों की उपस्थिति से इस वर्ग के मतदाताओं को एनडीए के पक्ष में देखा जा रहा है. यही वजह है कि राजद की बेचैनी ब़ढी हुई है. पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी सोनपुर में भाजपा के विनय कुमार सिंह के समक्ष कांटे की लड़ाई में फंसकर रह गई हैं. सही आकलन चुनाव परिणाम आने के बाद संभव है. फिलहाल ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना का़फी मुश्किल है. वैसे तीसरे चरण के चुनाव में ज़िले की सभी दस सीटों पर राजद और राजग गठबंधन के बीच कांटे की टक्कर रही है, जबकि कांग्रेस गड़खा, मांझी, तरैया एवं अमनौर विधानसभा क्षेत्रों में कड़ी चुनौती देने की स्थिति में है.

कांग्रेस के इन क्षेत्रों के उम्मीदवारों ने अपने सियासी कौशल और जनता के बीच अपनी मज़बूत पकड़ की बदौलत राजद एवं राजग गठबंधन के उम्मीदवारों का चुनाव मैदान में डटकर मुक़ाबला किया है. ज़िले की अधिकांश सीटों पर बाग़ी उम्मीदवारों की उपस्थिति से दलीय प्रत्याशी हैरान हैं. इसी तरह पूर्व बिहार में भी अश्विनी चौबे, शकुनी चौधरी, अनंत सिंह और विजय कृष्ण जैसे दिग्गज अपने चुनावी भविष्य को लेकर चिंतित नज़र आ रहे हैं. जीत को लेकर इनके दावों में उत्साह ज़्यादा और विश्वास कम दिखाई पड़ता है. किस प्रत्याशी को जीत नसीब होगी और पटना तक का स़फर कौन तय करेगा, इसका गणित मतदान प्रतिशत में इज़ा़फे के कारण भी उलझा है. राजद एवं राजग दोनों इसे अपने-अपने हिसाब से देख रहे हैं. राजद का मानना है कि वोट प्रतिशत का बढ़ना हमेशा सत्ता के खिला़फ जाता है. राजद के प्रधान महासचिव राम कृपाल यादव का कहना है कि इस चुनाव में ग़रीब लोग अपनी सरकार लाने के लिए बेचैन हैं, उनके घर की महिलाओं और युवकों का बड़ी संख्या में बूथों तक पहुंचना ही मतदान प्रतिशत बढ़ने का कारण है. जदयू के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. भीम सिंह का मानना है कि वोट प्रतिशत इसलिए बढ़ा है कि जनता की जनतांत्रिक व्यवस्था और सरकार के प्रति आस्था बढ़ी है. लोगों ने भयमुक्त होकर नीतीश सरकार की वापसी के लिए मतदान किया. उक्त अलग-अलग दावे बताते हैं कि सूबे में चुनाव परिणाम का सवाल कितना उलझा हुआ है. इस उलझन से पर्दा तो 24 नवंबर को ही उठेगा। -साभार चौथी दुनिया डोट कॉम

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